Durood-e-Ibrahim || दुरूद-ए-इब्राहीम
क्या आपने कभी सोचा है कि हर नमाज़ में पढ़ा जाने वाला दुरूद-ए-इब्राहीम इतना अहम क्यों है ?
जब एक मुसलमान नमाज़ के आख़िरी हिस्से में बैठता है, तो वह अल्लाह त’आला से अपने प्यारे नबी हज़रत मुहम्मद ﷺ पर रहमत और बरकत भेजने की दु’आ करता है। यही दुआ दुरूद-ए-इब्राहीम कहलाती है।
यह सिर्फ़ नमाज़ का एक हिस्सा नहीं, बल्कि नबी ﷺ से मोहब्बत और अदब का ख़ूबसूरत इज़हार भी है।
🌹 दुरूद-ए-इब्राहीम क्या है?
दुरूद-ए-इब्राहीम वह दुरूद है जो मुसलमान अपनी नमाज़ में तशह्हुद (अत्तहियात) के बाद पढ़ते हैं।
इस दुरूद में हम अल्लाह त’आला से दु’आ करते हैं कि वह हज़रत मुहम्मद ﷺ और उनकी आल पर रहमत और बरकत नाज़िल फ़रमाए, जिस तरह उसने हज़रत इब्राहीम عليه السلام और उनकी आल पर रहमत और बरकत नाज़िल फ़रमाई।
Durood-e-Ibrahim In Hindi
अल्लाहुम्मा सल्लि अला सय्यिदिना मुहम्मदिंव व अला आलि सय्यिदिना मुहम्मदिन कमा सल्लैता अला सय्यिदिना इब्राहीमा व अला आलि सय्यिदिना इब्राहिमा इन्नका हमीदुम मजीद
अल्लाहुम्मा बारिक अला सय्यिदिना मुहम्मदिंव व अला आलि सय्यिदिना मुहम्मदिन कमा बारकता अला सय्यिदिना इब्राहिमा व अला आलि सय्यिदिना इब्राहिमा इन्नका हमीदुम मजीद
Hindi Tarjuma
ऐ अल्लाह ! दुरूद भेज हमारे नबी मुहम्मद ﷺ पर और उनकी आल पर जिस तरह तूने दुरूद भेजी सय्यिदिना इब्राहिम पर और उनकी आल, बेशक तू तारीफ़ के लायक और महान है।
ऐ अल्लाह ! बरकत नाज़िल कर हमारे नबी मुहम्मद ﷺ पर और उनकी आल पर जिस तरह तूने बरकत नाज़िल की सय्यिदिना इब्राहिम पर और उनकी आल पर, बेशक तू तारीफ़ के लायक और महान है।
Durood-e-Ibrahim In English
Allahumma Salli Alaa Sayyideena Muhammadeenw Wa Aala Aali Sayyideena Muhammadeen Kamaa Sallaita Ala Sayyideena Ibrahima Wa Ala Aali Sayyideena Ibrahima Innaka Hameedum Mazid. Allahumma Bareek Ala Sayyideena Muhammadeenw Wa Aala Aali Sayyideena Muhammadeen Kamaa Barkataa Alaa Sayyideena Ibrahima Wa Ala Aali Sayyideena Ibrahima Innaka Hameedum Mazid.
Durood-e-Ibrahim In Arabic
اللَّهُمَّ صَلِّ عَلَى سَيِّدِنَا مُحَمَّدٍ وَعَلَى آلِ سَيِّدِنَا مُحَمَّدٍ كَمَا صَلَّيْتَ عَلَى سَيِّدِنَا إِبْرَاهِيمَ وَعَلَى آلِ سَيِّدِنَا إِبْرَاهِيمَ إِنَّكَ حَمِيدٌ مَجِيدٌ.
اللَّهُمَّ بَارِكْ عَلَى سَيِّدِنَا مُحَمَّدٍ وَعَلَى آلِ سَيِّدِنَا مُحَمَّدٍ كَمَا بَارَكْتَ عَلَى سَيِّدِنَا إِبْرَاهِيمَ وَعَلَى آلِ سَيِّدِنَا إِبْرَاهِيمَ إِنَّكَ حَمِيدٌ مَجِيدٌ.
🕌 दुरूद-ए-इब्राहीम कब पढ़ा जाता है ?
दुरूद-ए-इब्राहीम नमाज़ के आख़िरी हिस्से में तशह्हुद (अत्तहियात) के बाद पढ़ा जाता है।
हर दिन पाँचों वक़्त की नमाज़ में करोड़ों मुसलमान इसे पढ़ते हैं।
यह नमाज़ का एक अहम हिस्सा है और नबी ﷺ के प्रति मोहब्बत का खूबसूरत इज़हार भी है।
🌹 दुरूद पढ़ने की अहमियत
दुरूद शरीफ़ पढ़ना इस्लाम में एक बहुत बड़ा नेक अमल माना जाता है।
जब कोई मुसलमान नबी ﷺ पर दुरूद भेजता है, तो वह अपने दिल में उनके लिए मोहब्बत, अदब और एहतराम का इज़हार करता है।
दुरूद पढ़ना अल्लाह की याद और नबी ﷺ से जुड़े रहने का एक खूबसूरत ज़रिया है।
❤️ हमारी ज़िंदगी में दुरूद की अहमियत
आज की व्यस्त ज़िंदगी में हम कई बार अल्लाह की याद से दूर हो जाते हैं।
दुरूद शरीफ़ पढ़ना दिल को सुकून देता है और नबी ﷺ की याद को ताज़ा रखता है।
कई मुसलमान दिन भर में अलग-अलग मौकों पर दुरूद पढ़ते हैं और इसे अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा बनाते हैं।
🤲 एक खूबसूरत आदत
अगर हम रोज़ कुछ मिनट निकालकर दुरूद शरीफ़ पढ़ने की आदत बना लें, तो यह हमारे दिल में नबी ﷺ की मोहब्बत को और मज़बूत कर सकता है।
छोटे-छोटे नेक अमल ही इंसान को अल्लाह के करीब ले जाते हैं।
🌙 आख़िरी बात
दुरूद-ए-इब्राहीम हर मुसलमान की ज़िंदगी का एक अहम हिस्सा है।
यह हमें नबी ﷺ से मोहब्बत, अदब और उनके साथ अपने रिश्ते को मज़बूत करने की याद दिलाता है।
जब भी हम दुरूद पढ़ते हैं, तो हम अपने प्यारे नबी ﷺ के लिए रहमत और बरकत की दुआ करते हैं, और यही एक मोमिन के दिल की खूबसूरती है। 🌹